एमसीबी/मनेन्द्रगढ़
महाविद्यालय में राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी सम्पन हुई। उच्च शिक्षा में शोध केवल एक अकादमिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय विकास का एक प्रभावशाली माध्यम भी है। यह न केवल वर्तमान चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करता है, बल्कि भविष्य के लिए एक मजबूत आधार भी तैयार करता है। इसीलिए, उच्च शिक्षा संस्थानों में शोध कार्य को प्रोत्साहित किया जाना अत्यंत आवश्यक है, जिससे आत्मनिर्भर और सशक्त समाज का निर्माण संभव हो सके। इन्हीं उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए शासकीय विवेकानंद स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मनेन्द्रगढ़ में ‘शोध पद्धतिः मात्रात्मक और गुणात्मक दृष्टिकोण’ विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह संगोष्ठी महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. श्राबनी चक्रवर्ती के मार्गदर्शन एवं प्रेरणा तथा प्रो. रिजवान उल्लाह अपर संचालक, उच्च शिक्षा, सरगुजा संभाग के मुख्य संरक्षण तथा डॉ. सुशील कुमार तिवारी के संयोजन एवं डॉ. प्रभा राज और डॉ. अरूणिमा दत्ता (आइक्यूएसी प्रभारी) के सह-संयोजन में संपन्न हुई।
संगोष्ठी में बतौर मुख्य वक्ता डॉ. शुभाशीष बनर्जी, सहायक प्राध्यापक अंग्रेजी, नागालैंड केंद्रीय विश्वविद्यालय कोहिमा और डॉ. पुष्पिता रजावत, सहायक प्राध्यापक शिक्षा, डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर मध्यप्रदेश उपस्थित रहे। सर्वप्रथम प्राचार्य डॉ. चक्रवर्ती ने अपने उद्बोेधन में वेब पटल पर उपस्थित समस्त अतिथियों एवं प्रतिभागियों का अभिनंदन एवं स्वागत किया तथा् उन्होंने संगोष्ठी के आयोजन एवं उद्देश्य से सभी को अवगत कराया। उन्होंने बताया कि शोध पद्धति किसी भी अध्ययन की नींव होती है तथा यह शोध को व्यवस्थित, विश्वसनीय और प्रभावी बनाती है, जिससे समाज, विज्ञान और उद्योग के विभिन्न क्षेत्रों में नवीनतम खोज और समाधान संभव हो पाते हैं। यह किसी समस्या का गहन विश्लेषण कर उचित समाधान खोजने में सहायक होती है तथा अध्ययन को तार्किक और प्रामाणिक बनाकर सटीक निष्कर्ष प्रदान करती है, जिससे शोध की विश्वसनीयता और गुणवत्ता में वृद्धि होती है। उच्च शिक्षा में शोध शिक्षकों और छात्रों को अपने विषय में गहराई से जानकारी प्राप्त करने में सहायक होता है, जिससे शिक्षण प्रक्रिया अधिक प्रभावशाली और गुणवत्तापूर्ण बनती है। तत्पश्चात् उद्बोधन के क्रम में प्रथम वक्ता डॉ. शुभाशीष बनर्जी ने विशद विश्लेषण के द्वारा शोध की दोनों विधाओं- मात्रात्मक एवं गुणात्मक के मूलभूत अंतर, उपयोगिता तथा प्रासंगिकता को स्पष्ट किया। मात्रात्मक शोध की वैज्ञानिक विधियों, सांख्यिकीय उपकरणों और वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण के साथ ही, गुणात्मक शोध की अंतर्दृष्टिपूर्ण, संदर्भ आधारित तथा अनुभवजन्य प्रवृत्तियों पर उनका व्याख्यान अत्यंत प्रभावशाली रहा। दूसरे वक्ता डॉ. पुष्पिता रजावत ने अपने व्याख्यान में बताया कि मात्रात्मक शोध पद्धति संख्यात्मक डेटा, सांख्यिकीय विश्लेषण और गणितीय मॉडल पर आधारित होती है। इसमें डेटा को संख्याओं के रूप में एकत्र कर उनके बीच संबंधों का विश्लेषण किया जाता है। वहीं, गुणात्मक शोध पद्धति वर्णनात्मक और व्याख्यात्मक होती है, जो शब्दों, भावनाओं, धारणाओं और अनुभवों पर केंद्रित होती है। दोनों पद्धतियाँ अपने-अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं और शोध के उद्देश्यों के अनुसार इनका चयन किया जाता है। इस प्रकार शोधकर्ताओं को उपयुक्त विधा चयन करने में सहायक उनका यह व्याख्यान न केवल अनुसंधान की प्रक्रिया को स्पष्ट करता है, बल्कि एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने हेतु प्रेरित भी करता है। गूगल मीट एवं यू-ट्यूब लाइव इस वेब संगोष्ठी में देशभर से पाँच सौ से अधिक प्रतिभागियों ने सहभागिता की।
आज के आयोजन को सफल बनाने में आयोजन समिति एवं महाविद्यालयीन समिति के प्राध्यापक गण डॉ. सरोजबाला श्याग बिश्नोई, डॉ. रश्मि तिवारी, भीमसेन भगत, डॉ. नसीमा बेगम अंसारी, स्मृति अग्रवाल, अनूपा तिग्गा, कमलेश पटेल, सुनील कुमार गुप्ता, सुशील कुमार छात्रे, डॉ. रेनू प्रजापति एवं कार्यालयीन स्टॉफ यशवंत शाक्या, मनीष श्रीवास्तव, सुनीत जॉनसन बाड़ा, पीएल पटेल, बीएल शुक्ला, आर.के. गुप्ता मीना त्रिपाठी आदि का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। रंजीतमनी सतनामी, अभिषेक सिंह, थनेन्द्र कश्यप एवं शुभम गोयल ने तकनीकि सहयोग प्रदान किया। संगोष्ठी का संचालन संगोष्ठी संयोजक डॉ. सुशील कुमार तिवारी एवं सह संयोजक डॉ. प्रभा राज के द्वारा किय गया। कार्यक्रम के अंत में आभार प्रदर्शन डॉ अरूणिमा दत्ता, प्रभारी आईक्यूएसी के द्वारा किया गया। उन्होंने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सभी के सहयोग के प्रति आभार जताया।
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