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    महाकुंभ के बाद दिखाई नहीं देते नागा संत, विलुप्त होते हैं या छिप जाते हैं?

    News DeskBy News DeskJanuary 14, 2025No Comments4 Mins Read
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    महाकुंभ के बाद दिखाई नहीं देते नागा संत, विलुप्त होते हैं या छिप जाते हैं?
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    प्रयागराज। नागा साधुओं की अपनी जिंदगी है। उनके बारे में आम आदमी कुछ नहीं मालूम। जब भी कुंभ होता है हजारों की संख्या में नागा संत दिखाई देने लगते हैं। जैसे ही मेले का समापान होता है फिर इनके दीदार नहीं होते हैं। ये कहां जाते हैं क्या करते ऐसे ही कई सवालों के जवाब मीडिया तलाश रही है। इस पर नागा संत अर्जुन पुरी ने बताया कि वह पांच वर्ष की अवस्था से नागा संन्यासी हैं। जब बोध हुआ तो संतों की शरण में थे। उन्होंने बताया कि ज्ञान, भक्ति, वैराग्य के द्वारा मेरा पालन-पोषण हुआ। अब तक का पूरा जीवन संत जीवन ही रहा है। नागा संत ने बताया कि उन्हें जूना अखाड़े की तरफ से धर्म प्रचार के लिए पूरी दुनिया में भेजा जाता है। भारत समेत अन्य देशों में सनातनी लोगों का प्रचार-प्रसार करना मुख्य उद्धेश्य है।
    कहां चले जाते हैं नागा संन्यासी
    नागा संत ने बताया कि कुंभ-महाकुंभ के बाद हम ठंडे स्थानों पर रहने चले जाते हैं। इसकी वजह यह है कि हमारे शरीर में ऊर्जा का स्तर काफी ज्यादा होता है। हम गर्मी को बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। इसलिए हम ठंडे स्थानों पर ही रहते हैं। उन्होंने कहा कि हम या तो हिमालय की तरफ या फिर हिमाचल प्रदेश में ऊंचाई वाली जगह चले जाते हैं, जहां भरपूर ठंड रहती है। फिर कभी बड़ा मेला लगता है तो हम वहां पहुंच जाते हैं। नहीं तो पहाड़ों पर गुफाओं में रहकर साधनारत रहते हैं। क्या करते हैं नागा संन्यासी, इस सवाल के जवाब में नागा संत अर्जुन पुरी ने बताया कि हम सनातन के सिपाही हैं। यह सनातन की फौज है। सनातन को विस्तारित करने, इसे सशक्त बनाने और इसका ध्वज पूरे विश्व में लहराने के लिए, नागा संतों की फौज बनाई जाती है। फिर उनको गुप्तचरों की तरह पूरे देश और विदेश में भेज दिया जाता है। वहां जाने के बाद हम लोग सनातनी धर्म-संस्कृति का प्रचार-प्रसार करते हैं।
    नागा संन्यासी बनाने की प्रक्रिया
    संत अर्जुन पुरी ने बताया कि नागा संन्यासी बनने की प्रक्रिया बहुत कठिन है। सभी को नागा संन्यास नहीं दिया जाता। सिर्फ उन्हीं को दिया जाता है जो बचपन से नागा संन्यासियों की शरण में आ जाते हैं। उन्होंने बताया कि इसके बाद उन्हें कई तरह की कठोर साधनाओं, तपस्याओं, ध्यान-योग और पूजा-पाठ से गुजरना पड़ता है। बचपन से ही उनका लिंग मर्दन किया जाता है। नागा संन्यास में दिगंबर और श्री दिगंबर बनने के लिए बचपन से ही इसकी दीक्षा ली जाती है। नागा संत अर्जुन पुरी के मुताबिक नागा संन्यासी के दिन की शुरुआत तीन-साढ़े तीन बजे से हो जाती है। स्नान आदि के बाद हम जप में लग जाते हैं। इसके बाद हवन करते हैं। इन सबके बाद पठन-पाठन का दौर शुरू होता है। जो लोग पढ़ नहीं सकते हैं वह जाप करते हैं। उन्होंने बताया कि इसके अलावा वह लोग सेवा आदि भी करते हैं। आश्रम में साफ-सफाई समेत अन्य काम भी वह सब करते हैं। जो लोग पढ़ने-लिखने में सक्षम हैं, वह धर्म ग्रंथों के पठन-पाठन में लगे रहते हैं।
    नागाओं को ठंड क्यों नहीं लगती?
    ठंड नहीं लगने के पीछे भी नागा संन्यासी ने वजह बताई। उन्होंने कहाकि हम मंत्र से अभिमंत्रित करके भभूति को लगाते हैं। यह हमारे लिए विशेष कपड़े के रूप में काम करता है। इसके अलावा हम अपना जीवन नियम-संयम से जीते हैं। हम कई तरह के भोगों से दूर रहते हैं। इसलिए शरीर में ऊर्जा और अग्नि लगातार बनी रहती है। हमारा शरीर अंदर से गर्म और मजबूत बना रहता है। इससे हम मौसम की मार से बचे रहते हैं। इस सवाल के जवाब में नागा संन्यासी ने बताया कि लोगों को डरना नहीं चाहिए। असल में हम भभूत लगाकर बैठते हैं। चित्त से लेकर शरीर तक हम नग्न रहते हैं। हमें लगता है कि इसी वजह से लोगों को भय सा लगा रहता है। इसके अलावा लोगों के मन में भ्रांति बन गई है कि नागा साधु बड़े कठोर होते हैं। लेकिन असलियत यह है हमारा हृदय मक्खन की तरह से कोमल होता है। उन्होंने कहाकि हम लोगों से कहना चाहते हैं कि सारा समाज संतों की शरण में आए। किसी तरह का डर-भय न रखें। डरने की कोई जरूरत नहीं। हम नागा संन्यासी बहुत दयावान होते हैं।

    News Desk

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