गौरी शंकर गुप्ता/रायगढ़। छत्तीसगढ़ सरकार एक तरफ जहां प्रदेश में ‘सुशासन’ और ‘भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस’ की नीति का बड़े पैमाने पर प्रचार-प्रसार कर रही है, वहीं दूसरी ओर रायगढ़ जिले के लैलूंगा जनपद पंचायत से भ्रष्टाचार और घटिया निर्माण की बेहद चौंकाने वाली तस्वीरें सामने आ रही हैं। जमीनी हकीकत यह है कि लैलूंगा जनपद क्षेत्र के अंतर्गत सरकारी खजाने और जनता के टैक्स के पैसों की खुली डकैती चल रही है, जिसके चलते लाखों रुपये की लागत से स्वीकृत बुनियादी ढांचागत संरचनाएं (सड़कें, नालियां, दीवारें) बनने के कुछ ही महीनों और हफ्तों के भीतर भरभराकर ढह रही हैं।
इस बदहाली ने न केवल निर्माण एजेंसियों के हौसलों को उजागर किया है, बल्कि तकनीकी मॉनिटरिंग के लिए जिम्मेदार ग्रामीण यांत्रिकी सेवा (RES) और जनपद पंचायत के शीर्ष अधिकारियों की भूमिका पर भी कई गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
जहाँ देखिए, वहीं बिखर रहा ‘विकास’: पंचायतों का बुरा हाल
लैलूंगा के ग्रामीण अंचलों से आ रही तस्वीरें आरईएस विभाग की तकनीकी लापरवाही और कागजी दावों की पोल खोलने के लिए काफी हैं:
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ग्राम जामबाहर: इस पंचायत में लाखों की भारी-भरकम लागत से बनाई गई सीमेंट नाली अपनी पहली ही बरसात या उपयोग को भी बर्दाश्त नहीं कर सकी। नाली की दीवारें जगह-जगह से चटक कर टूट चुकी हैं, कंक्रीट उखड़ रहा है और प्रयुक्त की गई घटिया सामग्री साफ तौर पर सतह पर नजर आ रही है।
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ग्राम सागरपाली: यहाँ सुरक्षा के दृष्टिकोण से लाखों की लागत से खड़ी की गई भारी ‘गाइडवाल’ महज एक साल के भीतर ही पूरी तरह से ढह कर मलबे में तब्दील हो गई है।
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ग्राम बेसकीमुड़ा: इस गांव में हाल ही में बनाई गई सीमेंट कंक्रीट (CC) सड़क की गिट्टियां अभी से उखड़कर बाहर आने लगी हैं और सड़क के किनारे पूरी तरह से टूट-फूट चुके हैं, जिससे राहगीरों का चलना दूभर हो रहा है।
मानक M-20 का, काम ‘बालू-गिट्टी’ के ढेर का!
तकनीकी रूप से देखा जाए तो किसी भी गुणवत्तापूर्ण और टिकाऊ CC सड़क के निर्माण के लिए M-20 ग्रेड (1 भाग सीमेंट : 1.5 भाग बालू : 3 भाग गिट्टी) का कंक्रीट मिक्सचर और 15 से 20 सेंटीमीटर की मोटाई अनिवार्य होती है।
नियमों की धज्जियां उड़ाने का गणित:
बेसकीमुड़ा और आसपास के क्षेत्रों के ग्रामीणों का आरोप है कि ठेकेदारों और निर्माण एजेंसियों ने नियमों को पूरी तरह से ताक पर रख दिया है। मौके पर 1 भाग सीमेंट के साथ 5 भाग बालू और 8 भाग गिट्टी का अत्यंत कमजोर और घटिया मिश्रण तैयार कर ढाला जा रहा है। इसके साथ ही सड़क की मोटाई भी तकनीकी एस्टीमेट (अनुमानित मोटाई) की तुलना में आधी—बमुश्किल 7 से 10 सेंटीमीटर—रखी जा रही है। ग्रामीणों के अनुसार, यह सीधा-सीधा सरकारी धन की लूट का मामला है।
CEO और RES विभाग खामोश: क्या ‘कमीशन’ का है खेल?
इस पूरे मामले में सबसे गंभीर आरोप लैलूंगा जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) और ग्रामीण यांत्रिकी सेवा (RES) के जिम्मेदार सब-इंजीनियरों व इंजीनियरों पर लग रहे हैं। स्थानीय जनप्रतिनिधियों का कहना है कि ये जिम्मेदार अधिकारी कभी भी एसी कमरों से बाहर निकलकर निर्माण कार्यों का जमीनी निरीक्षण नहीं करते।
कार्य का नियमित निरीक्षण न होना और घटिया निर्माण के स्पष्ट प्रमाण होने के बावजूद ठेकेदारों के अंतिम भुगतान (बिल) का धड़ल्ले से पास हो जाना, इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि विभाग और ठेकेदारों के बीच ‘कट-मनी’ और कमीशन का खेल बड़े पैमाने पर चल रहा है।
आक्रोशित ग्रामीणों की मांग: ‘कागजी विकास’ की हो थर्ड पार्टी जांच
लैलूंगा के नागरिकों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों में प्रशासनिक उदासीनता को लेकर भारी रोष व्याप्त है। उन्होंने जिला कलेक्टर और उच्चाधिकारियों से निम्नलिखित बिंदुओं पर त्वरित कार्रवाई की मांग की है:
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निष्पक्ष तकनीकी व वित्तीय जांच: ग्राम जामबाहर, सागरपाली, बेसकीमुड़ा सहित लैलूंगा जनपद में पिछले एक वर्ष में हुए सभी निर्माण कार्यों की निष्पक्ष ‘थर्ड पार्टी’ (तीसरे पक्ष) से तकनीकी जांच कराई जाए।
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जिम्मेदारों पर FIR: गुणवत्ता से खिलवाड़ करने वाली निर्माण एजेंसियों, लापरवाही बरतने वाले दोषी इंजीनियरों और मूकदर्शक बने अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज कर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए।
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रिकवरी और पुनर्निर्माण: बर्बाद हो चुके कार्यों की पूरी वित्तीय राशि दोषी अधिकारियों और एजेंसियों की संपत्ति से रिकवर की जाए और उन कार्यों को दोबारा निर्धारित मापदंडों के अनुसार बनाया जाए।
संपादकीय रुख: यदि रायगढ़ जिला प्रशासन ने समय रहते लैलूंगा के इस बड़े निर्माण घोटाले पर कड़ा संज्ञान नहीं लिया, तो सरकारी खजाने की यह संगठित लूट बदस्तूर जारी रहेगी और सरकार का ‘सुशासन’ केवल विज्ञापनों और होर्डिंग्स तक ही सिमट कर रह जाएगा।
