गौरी शंकर गुप्ता/बिलासपुर/रायगढ़ (छत्तीसगढ़)। रायगढ़ जिले के तहसील घरघोड़ा में कार्यपालिक दंडाधिकारी/तहसीलदार द्वारा कानून के नियमों को ताक पर रखकर पारित किए गए एक मनमाने आदेश के विरुद्ध माननीय छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (बिलासपुर) ने कड़ा रुख अपनाया है। उच्च न्यायालय ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में राज्य शासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए 25,000 रुपये का जुर्माना (Cost) लगाया है। यह राशि 30 दिवस के भीतर याचिकाकर्ता को प्रदान करने के सख्त निर्देश जारी किए गए हैं।
जानिए क्या है पूरा मामला? (प्रकरण का विवरण)
मामले के अनुसार, 05 अक्टूबर 2025 को फिरोज कश्यप नामक व्यक्ति द्वारा याचिकाकर्ता अशरफ बेग के विरुद्ध घरघोड़ा थाने में शिकायत दर्ज कराई गई थी।
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प्रतिबंधात्मक कार्रवाई: शिकायत के आधार पर घरघोड़ा पुलिस ने तहसीलदार/कार्यपालिक दंडाधिकारी के समक्ष भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126, 130 के तहत प्रतिबंधात्मक कार्रवाई हेतु प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।
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तहसीलदार का आदेश: इस पर सुनवाई करते हुए तहसीलदार ने याचिकाकर्ता को 1 लाख रुपये की जमानत राशि और जमानतदार प्रस्तुत करने का आदेश दिया।
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जमानत के बावजूद जेल: याचिकाकर्ता अशरफ बेग ने तहसीलदार के निर्देशानुसार तय जमानत राशि और जमानतदार पेश कर दिया। लेकिन इसके बावजूद कार्यपालिक दंडाधिकारी/तहसीलदार ने प्रक्रियात्मक नियमों की अनदेखी करते हुए अशरफ बेग को जेल में निरुद्ध (जेल भेजने) करने का आदेश पारित कर दिया।
हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते ही मची खलबली
तहसीलदार के इस मनमाने और गैर-कानूनी आदेश से क्षुब्ध होकर अशरफ बेग ने अपने अधिवक्ताओं श्री सुनील ठाकुर एवं श्री आशुतोष मिश्रा के माध्यम से माननीय उच्च न्यायालय छत्तीसगढ़ के समक्ष याचिका प्रस्तुत की।
जैसे ही घरघोड़ा प्रशासन को हाईकोर्ट में याचिका दायर होने की भनक लगी, प्रशासनिक अमले में खलबली मच गई। अपनी गर्दन फंसती देख तहसीलदार ने आनन-फानन में याचिकाकर्ता का रिहाई आदेश जारी कर दिया। इसके बावजूद, मामले की गंभीरता को देखते हुए माननीय उच्च न्यायालय ने राज्य शासन के विरुद्ध कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब तलब किया था।
याचियों के वकीलों ने कोर्ट में दीं ये मजबूत दलीलें
मामले की अंतिम सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता सुनील ठाकुर एवं आशुतोष मिश्रा ने युगलपीठ के समक्ष जोरदार तर्क प्रस्तुत किए:
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गिरफ्तारी की सूचना न देना: पुलिस और प्रशासन द्वारा गिरफ्तारी और कार्रवाई की समुचित पूर्व सूचना नहीं दी गई।
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असंज्ञेय मामला: प्रकरण में कोई संज्ञेय अपराध (Cognizable Offense) आकर्षित नहीं होता था, फिर भी कठोर रुख अपनाया गया।
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अनुच्छेद 21 का उल्लंघन: जमानत की शर्तें पूरी करने के बाद भी जेल भेजना संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का घोर उल्लंघन और पूर्णतः मनमाना व विधि-विरुद्ध कदम है।
युगलपीठ का ऐतिहासिक फैसला और सख्त टिप्पणी
मामले के सभी तथ्यों, दस्तावेजों और अधिवक्ताओं के तर्कों पर सूक्ष्मता से विचार करने के पश्चात माननीय उच्च न्यायालय की युगलपीठ— माननीय मुख्य न्यायाधीश श्री रमेश सिन्हा एवं माननीय न्यायमूर्ति रविंद्र अग्रवाल ने तहसीलदार के आदेश को खारिज कर दिया।
माननीय विद्वान युगलपीठ ने स्पष्ट शब्दों में टिप्पणी करते हुए कहा कि कार्यपालिक दंडाधिकारी का यह आदेश माननीय उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) एवं उच्च न्यायालय द्वारा पूर्व में प्रतिपादित विधिक सिद्धांतों की खुली अवहेलना है।
कोर्ट का मुख्य आदेश:
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उच्च न्यायालय ने याचिका को पूरी तरह स्वीकार कर लिया।
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राज्य शासन के विरुद्ध सख्त अनुशासनात्मक संदेश देते हुए ₹25,000 का जुर्माना लगाया।
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आदेशित किया गया कि जुर्माने की यह पूरी राशि 30 दिनों के भीतर पीड़ित याचिकाकर्ता अशरफ बेग को क्षतिपूर्ति के रूप में प्रदान की जाए।
