घरघोड़ा (रायगढ़)। भारतीय संस्कृति में “गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरा” जैसे पौराणिक मंत्रों के साथ शिक्षक को ईश्वर से भी ऊंचा दर्जा दिया गया है। देश में अज्ञानता का अंधकार दूर कर ज्ञान की रोशनी फैलाने वाले शिक्षकों का आदर आदि-अनादि काल से होता रहा है। हालांकि, रायगढ़ जिले के घरघोड़ा निवासी वरिष्ठ लेखक गौरीशंकर गुप्ता ने एक विचारोत्तेजक आलेख के माध्यम से वर्तमान शिक्षा प्रणाली और तेजी से बदलती तकनीक पर बड़ा सवाल उठाया है। उनका मानना है कि जिस तरह से बदलाव हो रहे हैं, संभव है कि आने वाले समय में बच्चों को इतिहास की किताबों में पढ़ना पड़े कि कभी स्कूलों में इंसानी शिक्षक पढ़ाया करते थे।
आजाद भारत के शुरुआती दौर से लेकर अब तक शिक्षा के क्षेत्र में कई प्रयोग किए गए। इसमें से कुछ सफल रहे तो कुछ पूरी तरह विफल। शिक्षाविदों का मानना है कि अंग्रेज शासक लॉर्ड मैकाले द्वारा लागू की गई शिक्षा पद्धति ने भारत की प्राचीन ज्ञान-विज्ञान परंपरा को गहरा नुकसान पहुंचाया।
लेखक के अनुसार, मैकाले ने भारत के वास्तविक ज्ञान ढांचे को नष्ट कर अपने औपनिवेशिक हितों के अनुरूप बदलाव किए। आजादी के बाद तमाम सुधारों के बावजूद आज का शिक्षित समाज मैकाले के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया है। यही कारण है कि आज के इस साइंस युग में न तो एकलव्य जैसा समर्पित शिष्य मिलता है और न ही चाणक्य या अरस्तू जैसा दूरदर्शी गुरु। वर्तमान समय में शिक्षा केवल नौकरी पाने और जीविकोपार्जन का साधन मात्र बनकर रह गई है।
आलेख में पूर्ववर्ती मध्य प्रदेश शासन के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के कार्यकाल का भी उल्लेख किया गया है। उस समय दूरस्थ वनांचल क्षेत्रों में शिक्षकों की कमी दूर करने के लिए ‘शिक्षाकर्मी’ और ‘शिक्षामित्र’ जैसे अर्धशासकीय पदों का सृजन किया गया था। इस योजना से हजारों बेरोजगार युवाओं को रोजगार तो मिला और सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल भी खुले, लेकिन समान कार्य के बावजूद इन कर्मचारियों का अधिकांश जीवन वेतन विसंगति दूर कराने और नियमितीकरण की मांग में ही बीत गया।
आज के बदलते शैक्षणिक परिदृश्य पर चिंता जताते हुए यह सवाल उठाया गया है कि क्या भविष्य में शिक्षा का अर्थ केवल किताबी ज्ञान या डिग्री हासिल करना ही रह जाएगा? जिस तेजी से शिक्षा का डिजिटलीकरण हो रहा है, उससे आने वाले समय में बच्चे घरों पर ही कंप्यूटर व स्क्रीन के जरिए पढ़ते नजर आएंगे। ऐसे में बिना शिक्षक के स्कूल संचालित होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, जो भारतीय समाज में उच्च नैतिक मूल्यों के निर्माण के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
