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    छत्तीसगढ़

    सूकर पालन और बाड़ी विकास एक साथ-नरेगा योजना का अभिनव पहल

    News DeskBy News DeskMay 2, 2025No Comments3 Mins Read
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    सूकर पालन और बाड़ी विकास एक साथ-नरेगा योजना का अभिनव पहल
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    सफलता की कहानी

    सूकर पालन और बाड़ी विकास एक साथ-नरेगा योजना का अभिनव पहल

    नरेगा योजना की लाभ से इमलीवती बनी आत्मनिर्भर

    एमसीबी/बरबसपुर
    महात्मा गाँधी नरेगा योजना ने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने के लिए नई दिशा दी है। इस योजना ने ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं के जीवन में न केवल आर्थिक स्थिरता लाई है, बल्कि उन्हें अपनी क्षमता पहचानने का अवसर भी दिया है । मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले के मनेन्द्रगढ़ ब्लॉक के ग्राम महराजपुर  की निवासी इमलीवती ने इस योजना का लाभ उठाकर न केवल अपनी आजीविका सुदृढ़ की है, बल्कि अपने गांव की महिलाओं के लिए एक प्रेरणा बन गई हैं। उनकी सफलता की कहानी सूकर पालन और बाड़ी विकास के साथ एक अभिनव मॉडल प्रस्तुत करती है।

    नरेगा योजना से मिली इमलीवती को नई दिशा

           इमलीवती को नरेगा योजना के अंतर्गत उन्हें 1.20 लाख हजार रुपये का राशि प्राप्त हुआ। इस राशि का उपयोग उन्होंने सूकर फार्म शुरू करने के लिए किया। यह निर्णय लेना उनके लिए आसान नहीं था। महात्मा गांधी नरेगा अंतर्गत सूकर पालन फार्म निर्माण हो जाने से हितग्राही के जीवन में बदलाव आया है, मनरेगा के साथ-साथ सूकर पालन में वृद्धि हुई। अब पशुओं को बीमारी का डर नहीं है और साथ ही पक्का कोटर बन जाने से खिलाने वाला चारा का नुकसान नहीं होता। जिससे पशु चारे में लगने वाली लागत काफी कम हुई है। सूकर के बीमारी का खतरा कम हुआ है। अपने परिवार से सलाह-मशवरा कर उन्होंने ठोस योजना बनाई और इसे अमल में लाया। उनकी देखभाल में हर छोटी-बड़ी बात का ध्यान रखा गया। सूकर को समय पर भोजन, पानी और उचित देखभाल मिलती थी, जिससे उनकी वृद्धि सुचारू रूप से हुई।

    आर्थिक सशक्तिकरण के साथ सफलता की सफर पर पहुंची इमलीवती

           1.20 लाख हजार रुपये की लागत से शुरू किए गये इस व्यवसाय ने महज 6 महीनों में 5-6 सूकर रेडी हो जाते है। जिसकी कीमत लगभग 3000 से 4000 हजार रुपये की आमदनी हो रही है। इमलीवती ने बताया कि अब मजदूरी करने की ज्यादा चिंता नहीं रहती है। घर की खेती के आलावा बचे हुए समय में सूकर पालन करने से अतिरिक्त आमदनी का साधन बन गया है। इससे घर के खर्चे आसानी से चल जाते है। अपनी पहली सफलता के बाद  इमलीवती ने उसको धीरे-धीरे उनकी आय में वृद्धि हुई और वह अपने व्यवसाय को और अधिक विस्तृत करने लगी।

    इमलीवती बनी गांव के लिए प्रेरणा

         इमलीवती मेहनत और सूझबूझ ने उन्हें गांव की महिलाओं के लिए एक मिसाल बना दिया। उन्होंने साबित कर दिया कि अगर इच्छा शक्ति मजबूत हो और सही दिशा में कदम बढ़ाए जाएं, तो किसी भी बाधा को पार किया जा सकता है। नरेगा योजना से महिलाओं के सशक्तिकरण की नई कहानी ने ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने का जो मंच प्रदान किया है, वह अद्वितीय है। इमलीवती की सफलता इस बात का प्रमाण है कि सही मार्गदर्शन और संसाधन मिलने पर महिलाएं न केवल अपने परिवार, बल्कि समाज के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं। इमलीवती यह कहानी हमें यह सिखाती है कि हर समस्या का समाधान निकाला जा सकता है, बस हमें अपने भीतर की शक्ति को पहचानना होगा। सूकर पालन और बाड़ी विकास का यह अनूठा मॉडल न केवल ग्रामीण नरेगा का एक सफल उदाहरण है, बल्कि यह साबित करता है कि स्थानीय संसाधनों का उपयोग करके भी बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं। आज इमलीवती की मेहनत और उनकी कहानी छत्तीसगढ़ के हर कोने में गूंज रही है। उनकी यह सफलता “जहां चाह वहां राह“ की सच्ची मिसाल है।

    News Desk

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