नोएडा: रिटायर्ड आईएएस अफसर हरी शंकर मिश्रा की मौत के बाद उनकी करोड़ों रुपए की प्रॉपर्टी पर तीन महिलाओं ने दावा किया है. यह मामला अभी जांच के दौर में है कि कैसे एक अन्य व्यक्ति ने उनके नाम का आधार, पैन और अन्य दस्तावेजों का उपयोग कर एक प्लॉट किसी अन्य कंपनी को बेच दिया. यह घटना नोएडा प्राधिकरण में हुई है और इसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.
6 करोड़ की प्रॉपर्टी पर फर्जीवाड़े
यह प्लॉट सेक्टर-40 में स्थित है और इसका क्षेत्रफल लगभग 450 वर्गमीटर है. इसकी अनुमानित कीमत करीब 6 करोड़ रुपए है. प्राधिकरण ने इस मामले में जांच शुरू कर दी है और एक विशेष टीम का गठन किया गया है. यह टीम यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर प्रॉपर्टी का ट्रांसफर कैसे किया गया. रिटायर्ड आईएएस की मौत लगभग 8 साल पहले हो चुकी थी. लेकिन उसके बाद भी यह फर्जीवाड़ा कैसे हुआ, यह एक बड़ा सवाल है. जांच में फर्जी दस्तावेजों की लंबी श्रृंखला सामने आई है, जिसमें प्लॉट के फर्जी कागजात, आधार कार्ड, पैन कार्ड और बैंक में किए गए चालान शामिल हैं. यह स्पष्ट है कि इस पूरे फर्जीवाड़े को प्रमाणिक करने के लिए कोई न कोई संलिप्त था.
सॉफ़्टवेयर विकसित करने का प्रस्ताव
नोएडा प्राधिकरण ने इस मामले में गंभीरता से जांच शुरू की है. एसीईओ ने बताया कि वे सुनिश्चित करना चाहते हैं कि भविष्य में ऐसा न हो. दस्तावेजों की जांच की जा रही है और प्राधिकरण ने एक साफ्टवेयर डेवलप करने का विचार किया है, जिससे किसी भी ट्रांसफर ऑफ मैमोरंडम से पहले मूल आवंटी को एसएमएस भेजा जाएगा. यह प्लॉट वाई जानकी रमैया के नाम पर था, जिनकी मृत्यु करीब आठ साल पहले हुई थी. जब इस प्लॉट पर निर्माण कार्य शुरू किया गया, तब मृतक की बेटी को इसकी जानकारी हुई. उन्होंने थाना सेक्टर-39 में FIR दर्ज कराई, जिसके बाद पुलिस ने तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया.
जालसाजों ने बनवाया फर्जी आधार कार्ड
जालसाजों ने प्लॉट मालिक का फर्जी आधार कार्ड बनवाया और दिल्ली से एक टेलर को लाकर प्लॉट का मालिक बनाया. इसके बाद एक ब्रोकर के माध्यम से इस प्लॉट को दिल्ली निवासी एक व्यक्ति को बेच दिया गया. पुलिस ने इस मामले में शोएब, संदीप गोयल और शमशेर को गिरफ्तार किया, जिसमें शमशेर को प्लॉट का मालिक बनाया गया था. प्राधिकरण के एसीईओ ने बताया कि वे एक ऐसा साफ्टवेयर विकसित करने की योजना बना रहे हैं, जिससे किसी भी प्रॉपर्टी के ट्रांसफर से पहले मूल आवंटी को सूचना दी जाएगी. इससे यह सुनिश्चित होगा कि सभी ट्रांसफर वैध और प्रमाणिक हों. यह प्रक्रिया बैंकों में रकम के आदान-प्रदान की तरह होगी, जिससे फर्जीवाड़े की संभावना को कम किया जा सके.
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