भोपाल । भले ही एक साल से कम समय में उत्तराखंड में बीते रोज समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू कर दी गई हो, लेकिन इस मामले में मप्र फिसड्डी साबित हो रहा है। जबकि मप्र में इसके लिए कमेटी बनाने की घोषणा दो साल पहले कर दी गई थी। प्रदेश में न तो कमेटी का गठन हुआ और न ही इस दिशा में कोई कदम उठाया गया है। अहम बात तो यह है कि उत्तराखंड में यूसीसी लागू करने के साथ ही विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, लिव इन रिलेशन और इनसे संबंधित अन्य विषयों को भी रेगुलेट करने की तैयारी कर ली गई है। इसके अलावा वहां पर बहुविवाह और हलाला पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसके उलट मप्र में सरकार अब भी असमंजस में ही बनी हुई है। गौरतलब है कि तत्कालीन सीएम शिवराज सिंह चौहान ने दिसंबर, 2022 में समान नागरिक संहिता के लिए कमेटी बनाने की घोषणा की थी, लेकिन 2 साल से ज्यादा का समय बीतने के बाद भी अफसरशाही इस दिशा में एक कदम आगे नहीं बढ़ पाई। केंद्र सरकार ने जब मई-जून, 2023 में यूसीसी के मुद्दे को हवा दी थी, तो मप्र सरकार भी हरकत में आई थी। तब मप सरकार में मंत्री विश्वास सारंग ने मीडिया से चर्चा में कहा था, राज्य सरकार समान नागरिक कानून के लिए कृत संकल्पित है। प्रदेश में समान नागरिक संहिता लागू की जाएगी। उन्होंने इसके कानून के ड्राफ्ट के लिए जल्द कमेटी बनाए जाने की बात कही थी। हालांकि अब तक सरकार ऐसी किसी कमेटी का गठन नहीं कर पाई है। इसके बाद 27 जून, 2023 को भोपाल की चुनावी सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समान नागरिक संहिता का मुद्दा उठाया, तो यह बात सामने आई कि मप्र सरकार जल्द ही इसके कानून का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए एक्सपर्ट कमेटी का गठन करेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
किया जा रहा है आंकलन
प्रदेश में विधानसभा चुनाव के बाद शिवराज सिंह चौहान के स्थान पर डॉ. मोहन यादव मुख्यमंत्री बन गए। पिछले साल लोकसभा चुनाव के मौके पर जब एक बार फिर समान नागरिक संहिता का मुद्दा उठा, तो मप्र में इसको लेकर एक्सपर्ट कमेटी के गठन की सुगबुगाहट शुरु हो गई है। अब कहा जा रहा है कि इस कमेटी में एक्सपर्ट कमेटी सेवानिवृत्त न्यायाधीश, कानूनविद्, रिटायर्ड प्रशासनिक अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता आदि को रखा जाएगा। लेकिन इसका गठन कब किया जाएगा किसी को नहीं पता है। लोकसभा चुनाव के बाद से समान नागरिक संहिता का मुद्दा पूरी तरह से भुला दिया गया है। राजनीति के जानकारों का कहना है कि मप्र सरकार यूसीसी के लिए कमेटी बनाने की घोषणा के बाद से ही इस बात का आंकलन कर रही है कि इस मुद्दे पर उसे सियासी तौर पर कितना नफा या नुकसान होगा। चूंकि मप्र में धर्म आधारित राजनीति का बोलबाला नहीं है, यही वजह है कि सरकार इस मुद्दे पर आगे बढऩे को लेकर शुरुआत से ही असमंजस में है।
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