तीन माह से नहीं मिला स्व-सहायता समूहों को पैसा
भोपाल । प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में पढऩे वालों बच्चों के सुपोषण के लिए शुरू किए गए मध्यान्ह भोजन के बंद होने का खतरा मंडरा रहा है। दरअसल, स्कूलों में मध्यान्ह भोजन उपलब्ध कराने वाले स्व-सहायता समूहों को तीन महीने से पैसा नहीं मिल रहा है। ऐसे में स्व-सहायता समूह कर्ज लेकर स्कूलों में मध्यान्ह भोजन मुहैया करा रहे हैं। स्व-सहायता समूहों की बहनों का कहना है कि मध्याह्न भोजन की व्यवस्था इतनी भयावह हो चुकी है कि इसी 26 जनवरी से प्रदेश के सभी 96 हजार सरकारी स्कूलों में भोजन वितरण बंद करने की नौबत आ गई है। दरअसल, प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में मध्याह्न भोजन वितरण करना स्व सहायता समूहों के लिए चुनौती बन गया है। सरकार ने जिन स्व-सहायता समूहों की बहनों को स्कूलों में भोजन उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी दे रखी है, उन्हें बीते तीन माह से भुगतान नहीं किया जा रहा है। ऐसे में समूहों की महिलाएं इधर उधर से पैसों की जुगाड़ करके जैसे-तैसे भोजन वितरण की व्यवस्था बनाए हुए हैं। समूह द्वारा किराना दुकानों से उधार सामान लेकर वक्त पर पैसे नहीं चुकाने के चलते, अब उधार मिलना भी बंद हो गया है। कई क्षेत्र की महिलाएं तो लोन के साथ गहने तक गिरवी रखकर बच्चों को भोजन उपलब्ध करवा रही हैं।
30 साल पहले शुरू हुई थी योजना
गौरतलब हैं कि केंद्र सरकार ने 1995 में सरकारी स्कूलों की दयनीय स्थिति और बढ़ते कुपोषण को दूर करने के उद्देश्य से मध्याह भोजन योजना शुरू की थी। उसके बाद भी सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या कम होने के साथ ही कुपोषण का स्तर भी बढ़ता जा रहा है। मौजूदा स्थिति में भोजन की गुणवत्ता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। स्व-सहायता समूहों की बहनों का कहना है कि मध्याह्न भोजन की व्यवस्था इतनी भयावह हो चुकी है कि इसी 26 जनवरी से प्रदेश के सभी 96 हजार सरकारी स्कूलों में भोजन वितरण बंद करने की नौबत आ गई है। इधर, प्रांतीय महिला स्व-सहायता समूह महासंघ की अध्यक्ष सरिता सिंह बघेल ने पंचायत और ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद पटेल से लेकर प्रशासन स्तर तक इस संबंध में लिखित शिकायतें की हैं, लेकिन कोई भी अफसर उनकी शिकायतों पर संज्ञान लेकर राशि आवंटन करने की दिशा में कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है। इस मामले में पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अपर सचिव दिनेश जैन का कहना है कि ये भारत सरकार की योजना है। राशि देने में केंद्र की 60 प्रतिशत और राज्य सरकार की 40 प्रतिशत की भागीदारी है। वहीं हर माह के अंत में केंद्र सरकार को रिपोर्ट भेजी जाती है। यदि स्व-सहायता समूहों की 2-3 माह की राशि का भुगतान नहीं हो पाया है तो इसे चैक करवा लेंगे।
12 साल पहले मिलती थी एडवांस राशि
स्व-सहायता समूहों के पदाधिकारियों ने बताया कि 2013 तक मध्याह्न भोजन की राशि एडंवास मिल जाती थी। एडवांस राशि मिलने के चलते दुकानों से किराना सामान नगद ही खरीदा जाता था, लेकिन मौजूदा स्थिति में कभी दो महीने तो कभी चार महीने तक राशि का भुगतान नहीं किया जा रहा है। 96 हजार स्कूलों में स्व- सहायता समूह पहुंचाता है भोजन…. मप्र में प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल मिलाकर 98 हजार स्कूल संचालित हो रहे हैं। जिसमें 76 लाख विद्यार्थी अध्ययन कर रहे हैं। इसमें से करीब 96 हजार स्कूलों में स्व-सहायता समूह खाना देने का काम कर रहे हैं। बाकि दो हजार स्कूलों के विद्यार्थियों को मध्याह्न भोजन की व्यवस्था ठेके पर है। शिवपुरी स्थित श्री कृष्णा स्व-सहायता समूह द्वारा बताया गया कि वर्तमान में स्थिति इतनी खराब हो गई है कि न तो रसोई घरों में सब्जी है, न आटा और न ही दुकानदार अब उधार देने को तैयार हैं। बीते तीन महीनों से उधार लेकर भोजन तैयार किया जा रहा था, लेकिन यह कब तक संभव है? हम अपने जेवर गिरवी रखने के साथ ही अन्य लोगों से उधार मांगकर विद्यार्थियों को खाना खिला रहे हैं। गौरतलब है कि प्रदेश की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से समूहों का गठन कर भोजन की जिम्मेदारी सौंपी थी, लेकिन राशि नहीं आने से महिलाओं का मोह भंग हो रहा है।
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