गौरी शंकर गुप्ता/बिलासपुर (छत्तीसगढ़)। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय संवैधानिक पीठ (फुल बेंच) ने सेवा (मालगुजारी) भूमि पर मालिकाना अधिकार (Land Ownership) की मांग कर रहे राज्य भर के कोटवारों को बड़ा कानूनी झटका दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा, जस्टिस विभुदत्त गुरु और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कोटवारों के उस दावे को पूरी तरह से ठुकरा दिया है, जिसमें वर्षों से काबिज सेवा भूमि पर भू-स्वामी का हक देने की गुहार लगाई गई थी।
अदालत ने बेहद स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा कि लंबे समय से जमीन पर काबिज रहने या कोटवार के रूप में अपनी सेवाएं देने मात्र से कोई भी व्यक्ति सरकारी सेवा भूमि का मालिक नहीं बन जाता।
क्या था पूरा मामला?
ग्राम कोटवार गजेंद्र दास एवं अन्य ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर यह दावा किया था कि वे और उनके पूर्वज पीढ़ियों से मालगुजारी (सेवा) भूमि का उपयोग करते आ रहे हैं। परंपरागत आधार और लंबी काबिज अवधि का हवाला देते हुए याचिकाकर्ताओं ने राज्य सरकार से इस सेवा भूमि पर भू-स्वामी का पक्का अधिकार दिए जाने की मांग की थी।
कोर्ट में चली जोरदार कानूनी बहस
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत में दोनों पक्षों की ओर से तीखी कानूनी बहस देखने को मिली:
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याचिकाकर्ताओं का पक्ष: कोटवारों के वकील अंकित पांडे ने दलील दी कि परंपरागत रूप से कोटवारों को इस भूमि का उपभोग करने का अधिकार मिलता रहा है, इसलिए उन्हें वैधानिक रूप से मालिकाना हक दिया जाना चाहिए।
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राज्य सरकार का रुख: सरकार की ओर से पेश हुए महाधिवक्ता (Advocate General) विवेक शर्मा ने याचिका का कड़ा विरोध करते हुए स्पष्ट किया कि यह भूमि सेवा से बंधी हुई (Service Tenure Land) है। यह पद से जुड़ी संपत्ति है, जिस पर किसी का व्यक्तिगत मालिकाना हक कभी नहीं हो सकता।
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हस्तक्षेपकर्ताओं की आपत्ति: विद्याधर दास व अन्य की तरफ से अधिवक्ता विजय के. देशमुख तथा कोटवार एसोसिएशन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता किशोर भादुरी, ईशान भादुरी व अनिरुद्ध श्रीवास्तव ने अपना पक्ष रखते हुए इस मांग का पुरजोर विरोध किया।
“कानून में प्रावधान नहीं, सेवा भूमि राज्य की संपत्ति”
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुरक्षित रखे गए फैसले को सुनाते हुए फुल बेंच ने कोटवारों की सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया। भू-राजस्व संहिता (Chhattisgarh Land Revenue Code) का हवाला देते हुए अदालत ने बेहद स्पष्ट और तल्ख टिप्पणी की:
“सेवा भूमि का स्वरूप और उसका उपयोग पूरी तरह से भू-राजस्व कानूनों व निर्धारित सरकारी नियमों के अधीन है। महज कोटवार के रूप में कार्य करने या लंबे समय से जमीन पर काबिज रहने से किसी को भी उस सरकारी संपत्ति का स्वामी बनने का कानूनी अधिकार हासिल नहीं हो जाता।”
फैसले का दूरगामी प्रभाव
हाईकोर्ट के इस सख्त फैसले से यह संदेश पूरी तरह साफ हो गया है कि राज्य में सरकारी सेवा भूमियों का व्यक्तिगत, व्यावसायिक या हस्तांतरणीय दावों के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद प्रदेश भर के कोटवारों की सेवा भूमि पर मालिकाना हक पाने की वर्षों पुरानी कानूनी उम्मीदों पर पूर्ण विराम लग गया है।
