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    छत्तीसगढ़

    घरघोड़ा जमीन विवाद: बिना बंटवारे के बदल गया पैतृक जमीन का राजस्व रिकॉर्ड; कलेक्टर से शिकायत, पटवारी हल्का-18 जांच के दायरे में

    Knock IndiaBy Knock IndiaJuly 17, 2026No Comments4 Mins Read
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    घरघोड़ा जमीन विवाद: बिना बंटवारे के बदल गया पैतृक जमीन का राजस्व रिकॉर्ड; कलेक्टर से शिकायत, पटवारी हल्का-18 जांच के दायरे में
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    गौरी शंकर गुप्ता/रायगढ़ (घरघोड़ा)। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले से जमीन धोखाधड़ी और राजस्व विभाग की कथित मनमानी का एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने पूरे प्रशासनिक महकमे की साख पर बट्टा लगा दिया है. घरघोड़ा तहसील के ग्राम चारमार में एक पैतृक जमीन का बिना किसी कानूनी बंटवारे के फर्जी नामांतरण (Mutation) करने और फिर उसे रसूखदारों को बेचने का बड़ा खेल उजागर हुआ है. मामले की शिकायत जब सीधे रायगढ़ कलेक्टर तक पहुंची, तो हड़कंप मच गया. अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या विवादित जमीन पर खड़े किए गए अवैध निर्माण पर प्रशासन का बुलडोजर चलेगा या फिर लीपापोती कर दी जाएगी?

    बिना बंटवारे के रातों-रात बदल गया सरकारी रिकॉर्ड

    पूरा मामला ग्राम चारमार का है, जहां पीड़ित पक्ष के चिंतामणि गुप्ता और सरधाकर गुप्ता ने कलेक्टर को सौंपे गए शिकायती पत्र में राजस्व अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं. पीड़ितों के मुताबिक, उनकी पुश्तैनी और पैतृक भूमि का आज तक पूर्वजों या परिजनों के बीच कोई वैधानिक बंटवारा (Partition Order) नहीं हुआ था और न ही इसके लिए किसी ने सहमति दी थी.

    इसके बावजूद, हल्का नंबर-18 के पटवारी और अन्य राजस्व अमले की कथित मिलीभगत से कूटरचित (फर्जी) दस्तावेज तैयार किए गए और जमीन का नामांतरण कुछ अन्य लोगों के नाम पर दर्ज कर दिया गया.

    नायब तहसीलदार की कोर्ट पहुंचे, तब खुली ‘फर्जीवाड़े’ की परतें

    पीड़ित भाइयों को इस महा-फर्जीवाड़े की भनक तब लगी, जब उन्होंने अपने हिस्से के कानूनी बंटवारे के लिए नायब तहसीलदार के न्यायालय में आवेदन लगाया. कोर्ट में जब जमीन के दस्तावेज सामने आए, तो पीड़ितों के पैरों तले जमीन खिसक गई, क्योंकि राजस्व रिकॉर्ड से उनका नाम गायब कर किसी और का नाम दर्ज किया जा चुका था.

    गड़बड़ी छुपाने के लिए रिकॉर्ड में आनन-फानन में संशोधन?

    पीड़ितों ने शिकायत में एक और चौंकाने वाला दावा किया है. उनका कहना है कि जैसे ही इस फर्जीवाड़े की लिखित शिकायत उच्च अधिकारियों तक पहुंची, राजस्व अमले ने अपनी गर्दन बचाने के लिए सरकारी रिकॉर्ड में आनन-फानन में दोबारा संशोधन की प्रक्रिया शुरू कर दी. पीड़ितों का आरोप है कि यह पारदर्शी काम नहीं, बल्कि अपनी पुरानी गलतियों और भ्रष्टाचार को दबाने की एक सोची-समझी कोशिश है.

    विवादित जमीन की रजिस्ट्री भी हो गई और कोर्ट के नाक के नीचे खड़ा हो गया निर्माण!

    राजस्व रिकॉर्ड में फर्जी तरीके से नाम चढ़वाने के बाद खेल यहीं नहीं रुका. भू-माफियाओं और ठगों ने उस विवादित पैतृक जमीन का पंजीकृत विक्रय (रजिस्ट्री) भी किसी तीसरे पक्ष को कर दिया. हद तो तब हो गई जब मामला नायब तहसीलदार कोर्ट और जिला प्रशासन के संज्ञान में होने के बावजूद, विवादित जमीन पर धड़ल्ले से पक्की दीवार और निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया.

    जब इस संबंध में स्थानीय नायब तहसीलदार से सवाल किया गया, तो उन्होंने हमेशा की तरह एक रटा-रटाया और संक्षिप्त जवाब देकर पल्ला झाड़ लिया कि “मामला जांच में है, जांच में ही पता चलेगा।”

    तहसीलदार के ‘जांच’ वाले बयान पर खड़े हुए तीखे सवाल:

    नायब तहसीलदार के इस गैर-जिम्मेदाराना रवैये के बाद अब जनता और पीड़ित पक्ष कई तीखे सवाल दाग रहे हैं:

    • अगर मामला कोर्ट में लंबित और जांच के अधीन है, तो वहां धड़ल्ले से निर्माण कार्य किसकी शह पर जारी था?

    • क्या राजस्व विभाग ने निर्माण कार्य को रोकने के लिए कोई ‘स्टे’ या स्थगन आदेश जारी क्यों नहीं किया?

    • शिकायत के बाद अगर अब निर्माण कार्य रुका भी है, तो जो अवैध दीवार खड़ी हो चुकी है, उसे ढहाया जाएगा या वैसे ही छोड़ दिया जाएगा?

    • बिना किसी सक्षम कोर्ट के बंटवारा आदेश के पटवारी ने नामांतरण की फाइल को हरी झंडी कैसे दे दी?

    कलेक्टर से न्याय की उम्मीद, सख्त एक्शन की मांग

    पीड़ित परिवार ने रायगढ़ कलेक्टर से गुहार लगाते हुए पूरे मामले की किसी स्वतंत्र और उच्चस्तरीय टीम से निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है. इसके साथ ही फर्जी दस्तावेज बनाने वाले पटवारी, संलिप्त अधिकारियों और भू-माफियाओं के खिलाफ जालसाजी की एफआईआर (FIR) दर्ज करने, जमीन की फर्जी रजिस्ट्री को शून्य घोषित करने और विवादित स्थल पर हुए अवैध निर्माण को तुरंत ध्वस्त करने की मांग की गई है. अब देखना यह होगा कि रायगढ़ का जिला प्रशासन इस राजस्व भ्रष्टाचार पर क्या कड़ा रुख अख्तियार करता है.

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