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    छत्तीसगढ़

    सुकून और सशक्त बस्तर, नक्सल बीमारी से छुट्टी, आया सकारात्मक परिवर्तन

    Knock IndiaBy Knock IndiaApril 15, 2026No Comments9 Mins Read
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    सुकून और सशक्त बस्तर, नक्सल बीमारी से छुट्टी, आया सकारात्मक परिवर्तन
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    बस्तर संभाग के कई जिलों के सुदूर वनांचल जो कभी नक्सल गतिविधियों के गढ़ माने जाते थे, अब विकास और शांति का नया अध्याय लिख रहे हैं। जिन पहाड़ियों और जंगलों में कभी नक्सलियों की ट्रेनिंग हुआ करती थी, वहीं आज स्थानीय युवाओं को रोजगार उपलब्ध हो रहा है। इन इलाकों में लंबे समय तक नक्सलियों के प्रभाव तथा उनसे जुड़े लोगों द्वारा कानूनों की गलत व्याख्या ने ग्रामीणों को विकास की मुख्यधारा से दूर रखा। शासन के प्रति अविश्वास का वातावरण बना दिया गया। लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। ग्रामीणों ने इन तत्वों की वास्तविक मंशा को समझ लिया है और अब वे दूसरों की लड़ाई में अपना समय और भविष्य गंवाने को तैयार नहीं हैं।

    एक समय भय और हिंसा की पहचान रहे ये इलाके आज शांति, आजीविका और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं। वानिकी कार्यों के माध्यम से जल, जंगल एवं जमीन का संरक्षण करते हुए ग्रामीणों को स्थायी आजीविका उपलब्ध कराई जा रही है। बस्तर संभाग के नक्सल मुक्त गांव अब साबित कर रहे हैं कि जब विश्वास और विकास साथ आते हैं, तो परिस्थितियाँ बदलना केवल समय की बात होगी। छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी चुनौती रहे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सरकार ने सुरक्षा के साथ-साथ विकास और विश्वास को समान महत्व दिया है। कौशल प्रशिक्षण और पुनर्वास योजनाओं के माध्यम से युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ा जा रहा है। आर-सेटी एवं प्रोजेक्ट उन्नति के जरिए आत्मसमर्पित नक्सलियों सहित 5 हजार से अधिक हितग्राहियों को राजमिस्त्री का प्रशिक्षण दिया गया है। वहीं, 3416 आत्मसमर्पित नक्सलियों और नक्सल पीड़ित परिवारों को आवास की स्वीकृति दी गई है। पीएम-जनमन आवास योजना के अंतर्गत विशेष पिछड़ी जनजातियों के लिए 33 हजार से अधिक आवासों की स्वीकृति इस दिशा में एक ऐतिहासिक पहल मानी जा रही है।

    साय सरकार ने योजनाओं की निगरानी में आम नागरिक को सहभागी बनाकर पारदर्शिता को नई परिभाषा दी है। टोल-फ्री हेल्पलाइन, पंचायत स्तर पर क्यूआर कोड और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से कोई भी व्यक्ति विकास कार्यों की जानकारी सीधे प्राप्त कर सकता है। प्रधानमंत्री आवास योजना के हितग्राहियों को मनरेगा, उज्ज्वला, स्वच्छ भारत मिशन, जल जीवन मिशन और पीएम सूर्यघर जैसी योजनाओं से अभिसरण के माध्यम से जोड़ा गया है, जिससे समग्र लाभ सुनिश्चित हो रहा है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का कहना है कि शासन का वास्तविक उद्देश्य आम नागरिक के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना है। आवास, रोजगार, महिला सशक्तिकरण, जल संरक्षण और अधोसंरचना के समन्वित प्रयासों से छत्तीसगढ़ आज समावेशी और आत्मनिर्भर विकास की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। पारदर्शी, नवाचारी और जनोन्मुखी कार्यप्रणाली के कारण छत्तीसगढ़ अब केवल एक राज्य नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास का राष्ट्रीय मॉडल बन रहा है।

    अगर कुछ कर गुजरने का जज्बा मन में हो तो जीवन में हर काम आसान हो जाता है। इस कथन को आत्मसमर्पित माओवादियों ने चरितार्थ किया है। जिन हाथों ने कभी बंदूक थामकर हिंसा की राह अख्तियार किया था, आज उन्हीं हाथों को राज्य की नक्सल पुनर्वास नीति के तहत कुशल और दक्ष बनाने की कवायद जिला प्रशासन द्वारा की जा रही है। शासन की मंशानुसार ग्राम चौगेल (मुल्ला) कैंप में प्रशिक्षण देकर ’हिंसा से हुनर’ की ओर लौटे माओवादियों को नया जीवनदान मिल रहा है।

    कभी माओवाद गतिविधियों में संलिप्त रहे युवक-युवतियों को अब ड्राइविंग, सिलाई, काष्ठशिल्प कला, सहायक इलेक्ट्रिशियन जैसे विभिन्न ट्रेड में सतत् प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिससे वे समाज की मुख्य धारा में लौटने के बाद आजीविका मूलक गतिविधियों में कुशल होकर बेहतर ढंग से सम्मान पूर्वक जीवन निर्वाह कर सके।

    चौगेल कैंप परिसर बना कौशलगढ़

    वर्षों से लाल आतंक के साए में हिंसा का दंश झेल रहा बस्तर संभाग अब विकास की ओर शनैः-शनैः आगे बढ़ रहा है और माओवाद का दायरा धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है। छत्तीसगढ़ सहित देश को माओवाद से मुक्ति दिलाने केंद्र सरकार के संकल्प को पूरा करने प्रदेश सरकार हरसंभव प्रयास कर रही है। वहीं हथियार उठाने वालों को भविष्य गढ़ने का सुनहरा अवसर भी सरकार द्वारा दिया जा रहा है। आत्मसमर्पित/पीड़ित नक्सल पुनर्वास नीति-2025 के अंतर्गत उन्हें विभिन्न सृजनात्मक और रोजगारमूलक गतिविधियों के तहत प्रशिक्षण दिया जा रहा है। भानुप्रतापपुर विकासखंड से लगे ग्राम चौगेल (मुल्ला) का बीएसएफ कैम्प परिसर ‘कौशलगढ़’ बन गया है, जहां समाज की मुख्यधारा में लौटे 40 आत्मसमर्पित माओवादियों को अलग-अलग पाठ्यक्रमों में प्रशिक्षित किया जा रहा है, साथ ही उन्हें शिक्षित भी किया जा रहा है। आवश्यकतानुसार कक्षा पहली से आठवीं तक के पाठ्यक्रमों का नियमित अध्ययन कराया जा रहा है, जिसमें रूचि लेते हुए सभी आत्मसमर्पित माओवादी अपने भविष्य को पूरी शिद्दत से गढ़ने में संलग्न हैं। 20-20 का बैच बनाकर उन्हें हुनरमंद बनाने के सतत प्रयास किए जा रहे हैं।

    ड्राइविंग सीखने का शौक अब पूरा हो रहा- मनहेर तारम

    चारपहिया वाहन चालन का प्रशिक्षण ले रहे आत्मसमर्पित माओवादी 40 वर्षीय मनहेर तारम ने बताया कि पिछले दो सप्ताह से उन्हें ड्रायविंग की ट्रेनिंग दी जा रही है, जिसे वे पूरी रूचि के साथ सीख रहे हैं। ट्रेनर द्वारा स्टेयरिंग थामने से लेकर क्लच, ब्रेक व एक्सिलरेटर का प्रयोग करना सिखाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि ड्रायविंग सीखने की चाहत अब पूरी हो रही है। इसके अलावा सिलाई और काष्ठशिल्प का प्रशिक्षण कैम्प में दिया जा रहा है। इसी तरह नरसिंह नेताम ने बताया कि वह भी फोरव्हीलर की ड्रायविंग में अपना हाथ आजमा रहे हैं तथा यहां आकर ऐसी गतिविधियों से जुड़ रहे हैं, जिससे आगे का जीवन बेहतर हो सके। 19 साल के सुकदू पद्दा ने बताया कि यहां पिछले तीन महीने से ट्रेनिंग ले रहे हैं और खुद को आजीविका मूलक कार्यों से जोड़ रहे हैं, जबकि वह निरक्षर है। वहीं 19 वर्ष की कु. काजल वेड़दा ने प्रशिक्षण कार्यक्रम का अनुभव साझा करते हुए कहा कि यहां आकर अलग-अलग पाठ्यक्रमों में नियमित रूप से प्रशिक्षण दिया जा रहा है। उन्हें बचपन से कपड़ों की सिलाई करने की इच्छा थी, यहां आकर वह भी पूरी हो रही है। वहीं शिक्षकां के द्वारा प्राथमिक शिक्षा का भी वह लाभ ले रही हैं। इसी तरह कैंप में रह रहे जगदेव कोमरा, राजू नुरूटी, बीरसिंह मण्डावी, मैनू नेगी, सनऊ गावड़े, मानकी नेताम, सामको नुरूटी, उंगी कोर्राम, रमोती कवाची, मानकेर हुपेंडी, डाली सलाम, गेंजो हुपेंडी सहित सभी आत्मसमर्पित माओवादी अपनी रूचि अनुसार ड्राईविंग, काष्ठशिल्प कला, सिलाई मशीन तथा सहायक इलेक्ट्रिशियन ट्रेड में बेहतर ढंग से प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि स्वास्थ्य विभाग की टीम द्वारा उनका नियमितरूप से स्वास्थ्य परीक्षण कर आवश्यकतानुसार दवाईयां दी जाती हैं। कैम्प में मनोरंजनात्मक गतिविधियां कैरम, वाद्य यंत्र, विभिन्न प्रकार के खेल भी आयोजित किया जाता है।

    इस तरह आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटे माओवादियों को राज्य शासन द्वारा अवसर देकर उन्हें आत्मनिर्भर तथा स्वरोजगारमूलक सकारात्मक कार्यों से जोड़ा जा रहा है, जिससे उन्हें सम्मानपूर्वक जीवन व्यतीत करने का मौका मिल सके।

    जिन हाथों ने कभी बंदूक थामकर हिंसा की मार्ग अपनाया था, अब वहीं हाथ अपने हुनर का कमाल दिखा रहे हैं। भानुप्रतापपुर के पास ग्राम चौगेल के पुनर्वास केन्द्र में प्रशिक्षण प्राप्त आत्मसमर्पित नक्सलियों द्वारा हुनर दिखाते हुए काष्ठ कला से नेम प्लेट, छत्तीसगढ़ शासन का ‘लोगो’, ग्राम पंचायतों के लिए बोर्ड, बच्चों के लिए की-रिंग सहित अन्य सजावटी सामग्री तैयार की जा रही है, साथ ही कपड़े का थैला, कार्यालयों के लिए बस्ता भी तैयार किया जा रहा है। सरकार द्वारा घोषित नक्सल पुनर्वास नीति के तहत आत्मसमर्पित नक्सलियों को कुशल और दक्ष बनाने का सार्थक प्रयास किया जा रहा है। यहां पर उन्हें काष्ठशिल्प के साथ ही इलेक्ट्रिशियन, ड्रायविंग, सिलाई, राजमिस्त्री जैसे पाठ्यक्रमों का प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है। कभी नक्सली गतिविधियों में संलिप्त रहे युवक-युवतियॉ अब विभिन्न व्यवसाय में दक्ष हो रहे हैं, ताकि वे समाज की मुख्यधारा में शामिल होने के बाद आजीविकामूलक गतिविधियों से जुड़कर सम्मानपूर्वक जीवन निर्वाह कर सकें।

    चौगेल कैंप बना कौशल प्रशिक्षण केंद्र

    वर्षों से लाल आतंक के साए में हिंसा का दंश झेल रहा बस्तर संभाग अब विकास की ओर आगे बढ़ रहा है। शासन द्वारा नक्सल मुक्त बस्तर घोषित किया जा चुका है। हिंसा की राह त्यागकर मुख्यधारा में लौटे नक्सलियों को सरकार कौशल विकास का प्रशिक्षण दे रही है, ताकि वे सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर सकें। आत्मसमर्पित नक्सलियों को पुनर्वास नीति-2025 के अंतर्गत भानुप्रतापपुर विकासखंड के पास ग्राम चौगेल (मुल्ला) कैम्प में विभिन्न सृजनात्मक और रोजगारमूलक गतिविधियों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। कभी बीएसएफ का कैम्प रहा चौगेल (मुल्ला) का यह कैम्प अब हुनर सिखाने वाला गढ़ बन चुका है। यहां पर जिला प्रशासन द्वारा मुख्यधारा में लौटे 40 आत्मसमर्पित माओवादियों को अलग-अलग पाठयक्रमों जैसे- काष्ठ शिल्प, इलेक्ट्रिशियन, सिलाई, ड्राइविंग, राजमिस्त्री इत्यादि का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, साथ ही उनकी शिक्षा पर भी विशेष ध्यान दी जा रही है। पढ़ने के लिए पाठ्य सामग्री, पुस्तकें, पेन-पेंसिल दिए गए हैं तथा पढ़ाने के लिए योग्य शिक्षकों की व्यवस्था भी की गई है। स्वास्थ्य विभाग की टीम द्वारा आत्मसमर्पित नक्सलियों का नियमित रूप से स्वास्थ्य परीक्षण कर आवश्यकतानुसार दवाईयां भी दी जाती हैं। कैम्प में मनोरंजनात्मक गतिविधियां जैसे कैरम, वाद्य यंत्र, विभिन्न प्रकार के खेल भी आयोजित किया जाता है। चौगेल पुनर्वास केंद्र में राजमिस्त्री, इलेक्ट्रिशियन, वाहन चालक के साथ ही कांकेर में घुड़सवारी का भी प्रशिक्षण दिया जा चुका है। वर्तमान में सिलाई मशीन, काष्ठ शिल्प एवं असिस्टेंट इलेक्ट्रिशियन का प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है। स्वरोजगार के लिए सशक्त बनाने हेतु कृषि विभाग, मत्स्य पालन विभाग, उद्यानिकी, पशुधन विकास विभाग के साथ ‘बिहान’ के द्वारा एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन भी किया गया है।

    प्रशिक्षण उपरांत नियोजन करने वाला पहला जिला बना कांकेर

    पुनर्वास केंद्र में प्रशिक्षण उपरांत नक्सली पीड़ित एवं आत्मसमर्पित नक्सलियों को रोजगार से जोड़ने वाला कांकेर पहला जिला बन चुका है। शासन द्वारा अपने हाथों से तीन नक्सली पीड़ित और एक आत्मसमर्पित नक्सली को निजी क्षेत्र में नौकरी के लिए नियुक्ति पत्र सौंपा, इनमें पुनर्वासित सगनूराम आंचला एवं नक्सल पीड़ित रोशन नेताम, बीरसिंह मंडावी और संजय नेताम शामिल थे। इन सभी को निजी फर्म का नियुक्ति पत्र प्रदान किया गया, जहां उन्हें 15 हजार रूपए प्रतिमाह मानदेय और अन्य प्रकार की वित्तीय सुविधाएं प्राप्त होंगी। इन्होंने चौगेल कैम्प में असिस्टेंट इलेक्ट्रिशियन का प्रशिक्षण प्राप्त किया था तथा उन्हें निजी क्षेत्र में नियोजित किया गया है। मुख्यधारा में लौटकर प्रशिक्षण के उपरांत रोजगार प्रदान करने के मामले में उत्तर बस्तर कांकेर पहला जिला है। निजी क्षेत्र में नौकरी मिलने पर खुशी व्यक्त करते हुए माओवाद पीड़ित बीरसिंह मंडावी ने कहा कि ग्राम मुल्ला (चौगेल) के कैम्प में पुनर्जीवन मिला है, जहां निःशुल्क प्रशिक्षण देकर उन्हें कुशल एवं पारंगत बनाया गया, वहीं प्रशिक्षण के बाद जिला प्रशासन द्वारा रोजगार भी उपलब्ध कराया जा रहा है।

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